अरवल्ली जिले में वन क्षेत्र बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से CAMPA (कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग अथॉरिटी) योजना के तहत पिछले दो वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार विभिन्न तालुकाओं में लाखों-करोडो रुपये खर्च कर कईं हेक्टेयर क्षेत्र में कार्य किया गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस खर्च का वास्तविक परिणाम जमीन पर दिखाई दे रहा है या नहीं?
वर्ष 2024-25 के खर्च के आंकड़े: (विधानसभा के बजेट सत्र में पेश किए गए आंकडे)
मोडासा: ₹58.65 लाख – 20.18 हेक्टेयर
मालपुर: ₹265.94 लाख – 107 हेक्टेयर
मेघरज: ₹99.24 लाख – 30 हेक्टेयर
भिलोड़ा: ₹398.81 लाख – 181 हेक्टेयर
वर्ष 2025-26 के खर्च के आंकड़े:
मोडासा: ₹81.56 लाख – 40 हेक्टेयर
मालपुर: ₹288.89 लाख – 94 हेक्टेयर
मेघरज: ₹198.87 लाख – 95 हेक्टेयर
भिलोड़ा: ₹55.98 लाख – 30 हेक्टेयर
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अरवल्ली जिले में दो वर्षों के दौरान करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं। कागजों पर क्षेत्र विस्तार और वृक्षारोपण के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ अलग ही तस्वीर पेश कर रही है।
जमीन पर क्या है स्थिति?
प्राप्त जानकारी और क्षेत्र से मिल रही प्रतिक्रियाओं के आधार पर यह संकेत मिलते हैं कि कुछ स्थानों पर वृक्षारोपण कार्य अपेक्षित रूप से टिकाऊ नहीं रह पाया है। कहीं-कहीं लगाए गए पौधों के सूखने की बातें सामने आई हैं, तो कुछ जगहों पर कार्य केवल प्रारंभिक चरण तक सीमित रहने की चर्चाएं भी हैं। साथ ही, रखरखाव और निगरानी व्यवस्था को लेकर भी प्रश्न उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों का कहना है कि “वृक्षारोपण तो किया जाता है, लेकिन उनकी नियमित देखभाल पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।”
उठते सवाल
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद कितने पौधे जीवित हैं?
वृक्षारोपण के बाद रखरखाव की क्या व्यवस्था है?
क्या सिर्फ कागजी आंकड़े बढ़ाने के लिए काम किया जा रहा है?
क्या वन विभाग द्वारा कार्यों की जमीनी जांच की जाती है?
लोगों के टेक्स के पैसो का खर्च तो किया पर सर्वाईवल रेट पर अभीतक DFO की चुप्पी पर सवाल
जिम्मेदारी कौन लेगा?
CAMPA योजना के तहत हुए खर्च की पारदर्शिता और प्रभावशीलता को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। यदि पर्यावरण संरक्षण ही उद्देश्य है, तो केवल खर्च करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका परिणाम भी उतना ही जरूरी है। अरवल्ली जैसे वन क्षेत्र वाले जिले में ऐसी योजनाओं की सफलता बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए खर्च और परिणाम के बीच बड़ा अंतर नजर आ रहा है।
कागजी दावों और जमीनी सच्चाई के बीच की खाई को पाटना अब जरूरी हो गया है। अन्यथा करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य अधूरा ही रह जाएगा।



